Wednesday, October 1, 2014

इस क्षण प्रधानमंत्री की अमेरिका यात्रा का भारत के लिए क्या महत्व था

इस क्षण प्रधानमंत्री की अमेरिका यात्रा का भारत के लिए क्या महत्व था। दरअसल भारत और चीन के बीच भविष्य को ले कर एक अद्रष्य होड़ जारी हो चुकी है। जिस प्रकार दुनिया भर के  अर्थशात्रियों का मानना है की आने वाला समय ऐसिया का होगा। इसके मुख्य दावेदार भारत और चीन ही है। जब की प्रधानमंत्री ने अमेरिका में इसकी घोसणा भी करदी है। यही कारण है की भारत और चीन अपने अपने अस्तर पर भारतीय उपमहाद्वीप में इस की भूमिका पट्टी भी तैयार करने में जुट गए है।  रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण दक्षिण चीन सागर में वियतनाम की बन्दरगाह भारतीय नौसेना और वायुसेना के विमानों के लिए पूरी तरह से खुला हुआ है।
जिस के जवाब में भारत के दक्षिण में श्रीलंका के साथ चीन ने अपने समझौतों में वहां के बंदरगाहों के स्तेमाल की अनुमति प्राप्त करली है।
 इधर वियतनाम भारत से सैन्य-तकनीकी सहयोग चाहता है। और भारत से हलके लड़ाकू विमान और मिसाइल खरीदना चाहता है। उधर चीन मालदीप और पाकिस्तान के सीमावर्ती अक्षेत्रों में अपनी स्त्तिथि मजबूत कर रहा है। इसी कड़ी में  भारत हिन्द महासागर में अपने हितों की रक्षा करने में जुटा है। भारत को इस वक़्त  अपने पडोसी  देशों के साथ अपने सम्बन्धो को मजबूत करने की अवशक्ता है।
तभी हम विश्व महाशक्ति बनने का सपना देख सकते हैं।
वियतनाम इस सफर में हमारा अच्छा सहयोगी साबित हो सकता है। ज्ञात रहे वियतनाम की सेना दुनिया में पाँचवे नम्बर की सबसे बड़ी सेना है और दक्षिण-पूर्वी एशिया की तो वह सबसे बड़ी सेना है।
यदि चीन भारत की चिन्ताओं की कोई परवाह न करते हुए पाकिस्तान के साथ अपना सामरिक सहयोग जारी रखे हुए है। तो हमें भी अपने हितों को ध्यान में रखते हुए  वियतनाम के साथ रिश्तों का विकास करने ज़रूरत है। यह इस लिए भी ज़रूरी है कि भारत की यात्रा करने से पहले शी चिन फिंग ने श्रीलंका और मालदीव की यात्राएँ कीं।
चीनी राष्ट्र अद्ध्यक्ष की यह यात्राएं हमारे प्रधानमंत्री के पडोसी देशो के दौरे का रणनैतिक जवाब था।
मेरा मानना है की चीन हमें घेरने की नीति अपना रहा है और हमारा परम्परागत साथी रूस भी इस समय भारत के लिए कुछ ज़ियादा सहयोग करने की स्तिथि में नहीं है।
 इस लिहाज से प्रधानमंत्री का अमेरिकी दौरा भारत के लिए अति महत्वपूर्ण था।
 भारत अगर इस यात्रा को और गम्भीरता साथ रणनीतिक हतियार बनाता तो भारत के हित में एक बड़ा कदम हो सकता था।
क्यों की अमेरिकी हथियारों के लिए भारतीय बाज़ार अत्यंत महत्वपूर्ण है।
अमरीकी सैन्य उद्योग आजकल एक कठिन दौर से गुज़र रहा है। वड़े पैमाने पर अमरीकी हथियारों की बिक्री अमरीकियों की इस संकट से बचने में मदद कर सकती है।
इसलिए वाशिंगटन इस बात के लिए हर संभव प्रयास करता कि यूरोपीय और रूसी प्रतियोगियों को भारतीय बाज़ार से बाहर धकेल दिया जाए।
इसी मोके का महत्व पूर्ण लाभ उठाया जा सकता था। और एक कूटनीतिक वार चीन पर किया जा सकता था।
16-17 अक्टूबर को नई दिल्ली में होने वाली बैठक में सीमा विवाद संबंधी सभी विषयों पर बात होगी। उस वक्त भारत के अमेरिका के साथ रिश्तो की गर्माहट का चीन की रणनीति पर गहरा प्रभाव छोड़ा जा सकता था। अपितु मुझे प्रधानमंत्री की इस यात्रा में विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, और कूटनीतिक सलाहकारों के आपसी तालमेल का भरपूर अभाव दिखा। में समझता हूँ प्रधानमंत्री जी को मेरी इन चिन्ताओ पर विचार करने की अवशक्ता है।

कृपिया शब्दों की गलतियों पर ध्यान न दिया जाये।
क्यों की गूगल देवता के उपकार से लिखी गई हिंदी है।  

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