Saturday, March 28, 2015

अरविन्द ने न जाने कितने चहरों की पहचान चरणबद्ध तरीके से चुरा कर अपनी पहचान बनाई,

एक सवाल हर मन में और मीडिया में उठ रहा है की आंदोलन से जन्मी पार्टियां यूँही क्यों टूट जाती है। असल बात अभी तक यह सामने आई है कि आंदोलन के वक्त ऐसे लोगो को ढून्ढ ढून्ढ कर जोड़ा जाता है जिनकी बात का असर जनता पर पड़ता हो जो खुद पहले से किसी ना किसी छेत्र में एक ब्रांड हो। आंदोलन के वक़्त तो जनता को जोड़ने के लिए काम आएं इनके चेहरों का स्तेमाल खूब किया जाता है। और बाद में उन्हें किनारे लगा दिया जाता है। जैसे अरविन्द मनीष संजय , इनकी ना कोई पहचान थी ना ही कोई उपलब्धि, तब उन्होंने, सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना, किरण, योगेन्द्र, शांति, प्रशांत, मयंक, आनंद, साजिया, और ना जाने कितने चहरों की पहचान चरणबद्ध तरीके से चुरा कर अपनी पहचान बनाई, और जब इन धूर्तों का असल मकसद पूरा होगया तब उन्हें लात मारदी। दुखद है /

Saturday, January 24, 2015

ओबामा की सम्मान यात्रा का भारत को नफा, नुकसान।


मौजूदा दौर में दक्षिण एशिया और पूरब पश्चिम की आर्थिक लड़ाई चरम पर है।
ऐसे में ओबामा की भारत यात्रा के कई कोण बनते हैं। भारत का अमेरिका की ओर झुकाव चीन और रूस के बीच बढ़ता सहयोग, मित्रता व् व्यपार भारत के परम्परागत मित्र रूस का ध्यान भारत की और आकर्षित करने में सफलता प्राप्त कर सकता है। दूसरी ओर चीन को सीमाओ पर सैयम व्  पाकिस्तान की ओर झुकाव, पाकिस्तान को फौजी, आर्थिक डब्लपमेंट में मदत दे कर भारत पर कूटनीतिक दबाव की रणनीति में बदलाव को मजबूर कर सकता है। भारत अमेरिका की बढ़ती नज़दीकियाँ चीन का दक्षिण एशिया पर एक छत्र राज और दक्षिण एशिया  से नेचुरल रिसोर्सिस के दोहन का सपना धूमिल कर सकता है। मगर महत्पूर्ण यह भी है की भारत का यह दांव कहीं उलटा तो। अमेरिका का ट्रेक रिकॉर्ड यह कहता है कि अमेरिकी कंपनियां जहां जाती हैं वहाँ की डोमेस्टिक ढांचे की परवाह किये बगैर अंधाधुन्द दोहन करती हैं। सामाजिक स्तिथि की परवाह किये बगैर व्यापारिक रणनीति के चलते कल्चरल बदलाव कर अपने व्यापार के लिए फर्टाइल ज़मीन तैयार करती हैं। उनके इस कार्य में अमेरिकी सरकार कूटनीतिक दबाव बनती है और कंपनियों के समर्थन में भरपूर सहयोग करती हे। अगर भारत में ऐसी स्तिथि पैदा होती है तो सामाजिक टकराव बढ़ने के हालात पैदा हो सकते हैं। ज्ञात रहे खाड़ी के देशो में हो भी रहा है।  खाड़ी के देशो में भी अमेरिका दोस्त बन कर ही आया था। खतरा नंबर दो। ek ही तीर से दो निशाने शाधने के लिए चीन को अलग थलग करने के लिए अमेरिकी रणनीतिकार चीन के साथ भारत को मोहरा बना कर रूस और चीन पर कूटनीतिक दबाव बनाने की कोशिश कर सकते है।  इन दिनों चीन द्वारा दी जा रही आर्थिक टक्कर को सिमित करने के कोशिशो में भारत चीन के बीच तनाव को बढ़ावा दे कर अपने हित साधने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता। फिल हाल तो मेरे आंकलन में ओबामा का दौरा मोदी के अमेरिकी शो जैसा ही प्रतीत हो रहा है।  और किसी बड़ी घोषणा की संभावना ना के बराबर है। हाँ मगर में बड़ी बारीकी से भारत के इस नए चलन को देखने और समझने की कोशिश कर रहा हूँ। क्यों कि एक तरफ संघ परिवार का पश्चिम प्रेम और दूसरी और भारत के परम्परागत हितों के बीच मोदी सरकार किस करवट बैठती है देखना होगा। जय हिन्द 

Monday, October 20, 2014

चीन व् भारत की चिन्ता

चुनाव समर ख़त्म हुआ। आपसी रस्साकसी को विराम दे कर अब प्रधानमंत्री जी को विदेश नीति पर संजीदगी से ध्यान देने की ज़रुरत है। माना की पाक सीमा पर अशांति है। यह भारतीय चुनावी वादो के लिहाज़ से भी महत्वपूर्ण है। और मीडिया के चाट के दर्ष्टि से भी। मगर भारत के लिए अति महत्वपूर्ण चीन के साथ स्पर्धा है। जिस पर दक्षिण एशिया के साथ साथ पूरे विश्व की गहरी नज़र है। क्यों की हमारी महत्वकांक्षी सीमा सड़क योजना जिस पर हम ७ अरब डॉलर खर्च करने की योजना है। जो की हमारी सड़क योजनाओ के लिहाज़ से भी बहुत बड़ी है। और हमें इस योजना  को अंजाम तक पहुचना ज़रूरी है। दूसरी तरफ २०१५ तक चीन के साथ व्यपार को १०० अरब डॉलर तक लेजाने की योजना शि जिनपिंग के साथ मिल कर आप ने बनाई है। माना की चीन ऐसी ही परियोजनाओं को पाकिस्तान से लगती हमारी सीमाओ तक पहले ही अंजाम दे चूका है। मगर मेरा आंकलन यह है की अभी एक लम्बे समय तक चीन के साथ हमारे सीमा विवाद सुलझते नज़र नहीं आ रहे हैं। क्यों की चीन इस वक्त खुद को अगली दुनिया का लीडर   मनोवैज्ञानिक तोर पर मान चूका है। और अपना मुख्य प्रतिस्पर्धा भारत के साथ मान चूका है। उसकी इस सोच के आधार हाल ही में की जा रही अर्थशाष्त्रीयो की भविष्य वाणिया भी कहा जा सकता है। ऐसे हालत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक परिपक्व डिप्लोमेसी के साथ आगे बढ़ना चाहिए। यह वक्त विरोधी पार्टियों के तीखे सवालो और और भारत के दूधमुहे मीडिया के जाल से निकल है। और चीन की चिन्ताओ व् भारत की चिन्ताओ को सधे हुए ढंग से निपटारा करते हुए चीन के साथ मैत्री पूर्ण माहोल में भारत को ऊंचाइयों तक लेजाना चाहिए। जिस का ख्वाब भारत की जनता और पूरब पश्चिम मिल कर देख रहे हैं। जय हिन्द  

Monday, October 13, 2014

फंड का बहना भी नहीं चलेगा

अगर भारत के प्रधानमंत्री की इच्छा है की देश का सच मुच निर्माण हो और देश विश्व आर्थिक महाशक्ति बने। रास्ता बहुत ही आसान है। केंद्र सरकार अगर सचमुच गाँधी का भारत बना ना  चाहती है। भारत के ५४३ गांव पांच साल में विकास करने से क्या होगा सिवाय इस के की आप के सांसद मीडिया कवरेज में बने रहेंगे। रोड मेप बिलकुल आसान है।
भारत के हर गांव में टेक्नीकल  ट्रेनिंग अभियान चलाया जाये और इस काम की लगत मनरेगा से बहुत कम है। इसलिए फंड का बहना भी नहीं चलेगा।
गाँव गांव महिलाओ और गरीब तबके के लोगो को टेक्नीकल ट्रेनिंग दे कर इलेक्ट्रॉनिक छोटे छोटे रोज़ मर्रा के इस्तेमाल में आने वाले इलेक्ट्रॉनिक,कृत्रिम लकड़ी के उपकरण व् खिलोने ऐसम्बल करने मात्र को बढ़वा दिया जाये तो देश को खरबो रुपये की विदेशी पूँजी बचाने का मौका मिलेगा।गांव के सम्पन लोगो को इन सब के ज़रुरत का स्टोर खुलवाया जाये। और अगर कुछ इम्पोर्ट करना है तो खुद गोवेर्मेंट सर्किट और ज़रूरी लगने वाले सामान बने की मशीने मंगवाए रिसर्च सेंटर खोले। वेस्टेज से बनने वाले घरेलु सामान की रॉ मटीरियल बनाने वाली इंडस्ट्री को बढ़ावा दे।  और भी बहुत कुछ किया जा सकता। ज़ियदा लिखने का मोड़ नहीं है। मगर शुरुआत यहाँ से हो तो हो गया भारत निर्माण। और दुश्मन की हार भी साथ ही साथ तय है। जय हिन्द। मुझे उम्मीद है देश भगत प्रधानमंत्री जी मेरे लेख पर विचार करेंगे। जय हिन्द।  

Wednesday, October 1, 2014

इस क्षण प्रधानमंत्री की अमेरिका यात्रा का भारत के लिए क्या महत्व था

इस क्षण प्रधानमंत्री की अमेरिका यात्रा का भारत के लिए क्या महत्व था। दरअसल भारत और चीन के बीच भविष्य को ले कर एक अद्रष्य होड़ जारी हो चुकी है। जिस प्रकार दुनिया भर के  अर्थशात्रियों का मानना है की आने वाला समय ऐसिया का होगा। इसके मुख्य दावेदार भारत और चीन ही है। जब की प्रधानमंत्री ने अमेरिका में इसकी घोसणा भी करदी है। यही कारण है की भारत और चीन अपने अपने अस्तर पर भारतीय उपमहाद्वीप में इस की भूमिका पट्टी भी तैयार करने में जुट गए है।  रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण दक्षिण चीन सागर में वियतनाम की बन्दरगाह भारतीय नौसेना और वायुसेना के विमानों के लिए पूरी तरह से खुला हुआ है।
जिस के जवाब में भारत के दक्षिण में श्रीलंका के साथ चीन ने अपने समझौतों में वहां के बंदरगाहों के स्तेमाल की अनुमति प्राप्त करली है।
 इधर वियतनाम भारत से सैन्य-तकनीकी सहयोग चाहता है। और भारत से हलके लड़ाकू विमान और मिसाइल खरीदना चाहता है। उधर चीन मालदीप और पाकिस्तान के सीमावर्ती अक्षेत्रों में अपनी स्त्तिथि मजबूत कर रहा है। इसी कड़ी में  भारत हिन्द महासागर में अपने हितों की रक्षा करने में जुटा है। भारत को इस वक़्त  अपने पडोसी  देशों के साथ अपने सम्बन्धो को मजबूत करने की अवशक्ता है।
तभी हम विश्व महाशक्ति बनने का सपना देख सकते हैं।
वियतनाम इस सफर में हमारा अच्छा सहयोगी साबित हो सकता है। ज्ञात रहे वियतनाम की सेना दुनिया में पाँचवे नम्बर की सबसे बड़ी सेना है और दक्षिण-पूर्वी एशिया की तो वह सबसे बड़ी सेना है।
यदि चीन भारत की चिन्ताओं की कोई परवाह न करते हुए पाकिस्तान के साथ अपना सामरिक सहयोग जारी रखे हुए है। तो हमें भी अपने हितों को ध्यान में रखते हुए  वियतनाम के साथ रिश्तों का विकास करने ज़रूरत है। यह इस लिए भी ज़रूरी है कि भारत की यात्रा करने से पहले शी चिन फिंग ने श्रीलंका और मालदीव की यात्राएँ कीं।
चीनी राष्ट्र अद्ध्यक्ष की यह यात्राएं हमारे प्रधानमंत्री के पडोसी देशो के दौरे का रणनैतिक जवाब था।
मेरा मानना है की चीन हमें घेरने की नीति अपना रहा है और हमारा परम्परागत साथी रूस भी इस समय भारत के लिए कुछ ज़ियादा सहयोग करने की स्तिथि में नहीं है।
 इस लिहाज से प्रधानमंत्री का अमेरिकी दौरा भारत के लिए अति महत्वपूर्ण था।
 भारत अगर इस यात्रा को और गम्भीरता साथ रणनीतिक हतियार बनाता तो भारत के हित में एक बड़ा कदम हो सकता था।
क्यों की अमेरिकी हथियारों के लिए भारतीय बाज़ार अत्यंत महत्वपूर्ण है।
अमरीकी सैन्य उद्योग आजकल एक कठिन दौर से गुज़र रहा है। वड़े पैमाने पर अमरीकी हथियारों की बिक्री अमरीकियों की इस संकट से बचने में मदद कर सकती है।
इसलिए वाशिंगटन इस बात के लिए हर संभव प्रयास करता कि यूरोपीय और रूसी प्रतियोगियों को भारतीय बाज़ार से बाहर धकेल दिया जाए।
इसी मोके का महत्व पूर्ण लाभ उठाया जा सकता था। और एक कूटनीतिक वार चीन पर किया जा सकता था।
16-17 अक्टूबर को नई दिल्ली में होने वाली बैठक में सीमा विवाद संबंधी सभी विषयों पर बात होगी। उस वक्त भारत के अमेरिका के साथ रिश्तो की गर्माहट का चीन की रणनीति पर गहरा प्रभाव छोड़ा जा सकता था। अपितु मुझे प्रधानमंत्री की इस यात्रा में विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, और कूटनीतिक सलाहकारों के आपसी तालमेल का भरपूर अभाव दिखा। में समझता हूँ प्रधानमंत्री जी को मेरी इन चिन्ताओ पर विचार करने की अवशक्ता है।

कृपिया शब्दों की गलतियों पर ध्यान न दिया जाये।
क्यों की गूगल देवता के उपकार से लिखी गई हिंदी है।  

Monday, September 29, 2014

अमरीकी प्रणाली आधी दुनिया से २०२५ तक समाप्त हो जाएगी

भारत के प्रधानमंत्री को अमेरिका से वार्ता के वक़्त यह भी ध्यान रखने की ज़रुरत है की आज  ''शंघाई सहयोग संगठन'' रूस की सरपरस्ती में तेजी से आगे बढ़ रहा है। ''शंघाई सहयोग संगठन'' अगले बरस भारत और पाकिस्तान को जोड़ कर एक ऐसी प्रणाली को अंजाम देना चाहता है जिस के बाद अमरीकी प्रणाली आधी दुनिया से समाप्त हो जाएगी यह लक्ष्य २०२५ तक प्राप्त करने की योजना तैयार हो चुके हैं। जिसे शंघाई सहयोग संगठन रेशमी आर्थिक पट्टी के माध्यम से अमेरिकी प्रणाली विहीन एक अलग आर्थिक ढांचे के निर्माण की शुरुआत कर चुका  है। मुझे ऐसा प्रतीत होता है की आज अमेरिकी प्रेज़िडेंट से बात चीत में प्रधानमंत्री प्रस्पर आदानप्रदान की चर्चा खुल कर करने की हेसियत में हैं। क्यों की जिस प्रकार शंघाई सहयोग संगठन'' ने ईरान को पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद संगठन में आमन्त्रित किया है। इस से साफ़ हो जाता है की आने वाले दिनों में अमरीकी अर्थवयवस्था मुह बाए भारत के बाजार की और देखेगी। जय हिन्द   

माफ़ करना डांस कॉम्पिटिशन से देशों के विकासः नहीं होते बच्चे

दोस्तों एक छोटा सवाल है। कोई पत्रकार या विशेषज्ञ या अंध भगत मुझे या देश को यह बताये  की इस सरकार ने अमेरिका या जापान में कोनसा सौदा किया जिस भारत पर हर साल विदेशी मुद्रा भंडार में असंतुलन संतुलित होता हो। भारत को हर साल 135.794.49 मिलयन डॉलर की एक्स्ट्रा ज़रुरत होती हे जिस के कारण भारत में महंगाई लगातार बढ़ रही है क्यों की हमारा कुल एक्सपोर्ट है ३१४,४०५.30 मिलयन डॉलर और इम्पोर्ट है ४५०,१९९.79 मिलयन डॉलर है अब इस असंतुलन को कम करने या घाटे के आंकड़े को मुनाफे के आंकड़े में बदलने के लिए कोनसे कदम उठाये हैं। और अगर भारत में विदेशी कम्पनी को भारतीय इन्फरा इस्टक्चर को खरीदने की इजाज़त दी जाती है तो विदेशी कंपनी जो मुनाफा भारत में कमाएगी फिर उसे निकल कर अपने देश लेजाएंगी तब यह घाटा और बढ़ेगा रुपये की कीमत और गिरेगी महंगाई और बढ़ेगी। क्यों की उस मुनाफे के बदले भारत को अपनी ही पैदावार ,खनिज , या कीमती धातुओं से चुकानी पड़ेगी तब मांग और सप्लाई के सिद्धांत के चलते माल की कमी के कारण महंगाई असंतुलित बढ़ेगी। अगर यह कहा जाये जैसा की कहा ही जायेगा की हम तकनीक ला रहे हैं। तब एक सवाल यह बनता है की मेक इन इंडिया का क्या मतलब है। इस के दो तरीके हैं पहला विदेशी तकनीक लाएं और देश में बना कर देश को ही बेचे मुनाफा कमाए। दूसरा यह है की मेक इन इंडिया सेल आउट ऑफ़ इंडिया मिनिमम ७०% तब ज़रूर भारतीय अर्थ वयवस्था को लाब हो सकता है। और एक छोटा सा सवाल खाड़ी के देशो में लगातार हमारा एक्सपोर्ट घट रहा है इम्पोर्ट बढ़ रहा है जो की तेल के रूप में है।  इस घटे को काम करने के लिए सरकार ने कोनसे कदम उठाये हैं। माफ़ करना डांस कॉम्पिटिशन से देशों के विकासः नहीं होते बच्चे। जादूगर कमाल पाशा सिर्फ कबूतर मोमबत्ती से निकलते हुए दिखने की कला जनता है। इस का मतलब यह नहीं की वह कबूतर पैदा करना भी जानता है।  जय हिन्द