Saturday, September 13, 2014

एक ज़रूरी एलान

 एक ज़रूरी एलान > आज जिस उन्नति या प्रोग्रेस को हम सर झुका कर सलाम कर रहे हैं। क्या वो प्रोग्रेस ही है या कोई हमें धोका दे रहा है। आने वाले कुछ प्रोग्रेसिव कदम हम जिन्हे मान रहे हैं कुछ इस प्रकार हैं। हर वयक्ति का एक कॉड नंबर होगा , और सारी जानकरी उस में मौजूद होगी , इस के बहुत से फायदे भी होंगे मगर , एक नुक्सान यह भी की एक खास शिकारी इस के ज़रिये अपने शिकार को आसानी से खोज निकलेगा, शिकारी कोन है और केसा है इस की चर्चा ज़रा देर बाद पहले उसी कर्म को जारी रखते हैं। हर भारीतय का खता होना ज़रूरी है। क्यों की कल जब शिकारी को चारा डालना पड़ेगा  और वो चारा भी शुरक्षित रहे इस लिए बैंक खता ज़रूरी है। कल सभी भारतियों को क़र्ज़ के रूप में क्रेडिट कार्ड दिए जायेंगे। ई एम आई , डायरेक्ट अकॉउंट से काटी जाएगी। और फिर हर भारतीय सिर्फ ई एम आई को पूरा करने के लिए कमायेगा जैसा की यूरोप यू एस में हो रहा है। हाँ मगर कार्ड के पैसे वसूलने के लिए कुछ बहु बालियों को रोज़गार ज़रूर मिल जायेगा।  अगर कोई गरीब दे नहीं पायेगा या क़र्ज़ में डूब कर खुद कुशी कर लेगा तो एक नीति और बनेगी की अनुदान उनके खतों डाला जायेगा और फिर शिकारी बड़े आराम से वो अनुदान ऑटोमैटिक लूटलेगा। हर आदम जाती का इंश्योरेन्स इस लिए ज़रूरी होगा की शिकारी का चारा मेहफ़ूज़ रहे। अभी शिकारी जो की चारा भी देशी मछली का ही बनाएंगे और शिकार भी देशी मछली का किया जायेगा बस अभी कुछ दिनों तक सिर्फ विदेशी कांटा बहुत अच्छा है इसका प्रचार किया जायेगा। यह देश के लिए मछली पकड़ेगा और देश की भूख मिटेगी। असली बात वो सिर्फ देश से मछली पकड़ेगा अपने लिए। एक और नया एलान होगा की हमें किसी भी भारतीय की शुरक्षा हमें सब से प्यारी और हम उसे हर कीमत पर करेंगे। यह प्रचार अच्छे दिन आने का एलान भी होगा। और फिर शुरू होगी आप की सुरक्षा की गारंटी। आप के हर खाने की चीज़ पर एक सरकारी मोहर लगेगी जो यह साबित करेगी की यह खाना आप के लिए सुरक्षित है। और फिर आप उस खाने को खा सकेंगे। और अगर बिना सरकारी मुहर के किसी ने खाना खाया या बेचा तो सीधे जेल जायेगा। तब अच्छे दिन आजायेंगे अरे अरे अरे रुक्ये ज़रा एक बात का ज़िक्र रह गया। यह खाना आएगा कहाँ से ? यकीनन हमारे खेतों से? मगर एक सवाल फिर भी उठता है। क्या वो मोहर परम्परागत हमारी खेती को मंज़ूरी देगी अब सवाल यह भी उठता है की अगर परम्परागत खेती को ही मान्यता देनी होती तो इस  कानून की ज़रूरत हे क्या थी यानि शिकारी की यह चाल भी सफल रहेगी की आप के मुह का निवाला अब वो तय करेगा। यानि किसान अगर कुछ उगाएगे भी तो बेचेंगे कहाँ उस के पास हर दाने पर मुहर लगाने के लिए ना तो लेब होगी ना ही विश्व स्वतय संगठन का नान्यता प्राप्त बीज।   इस लिए चुप के से किसान को अपनी ज़मीन सरकारी मुहर पा चुके शिकारी को देनी पड़ेगी। और फिर खाना उगा कर देश को खिलने वाला किसान खुद भी किसी शिकारी की मुहर याफ्ता खाने को ही खा सके गा। और फिर एक दिन शिकारी सारी मछली समेट कर अपने वतन को लौट जायेगा और अपने पीछे छोड़ जायगा समंदर में तबाही के निशान कुछ सड़ी गली चारे वाली कांटिया। जिन्हे ले कर हम फिर सदियों तक लड़ते रहेंगे। मेरा यह लेख संभाल कर रखना यह अगले कुछ सालों की आने वाली हकीकत महज़ कलपना नहीं है। में उन विदेशी व्हेलों को जानता हूँ जो झुण्ड बना कर शिकार खेलने की माहिर हैं और ना जाने कितने तालाब पूरे के पूरे चट कर गई हैं> जय हिन्द         

8 comments:

  1. ये तो 90% हो चुका है सर वो तो भला हो किसानों का नही तो 100% हो चुका होता ये सब

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  2. यह न्यू वर्ल्ड आडर का आगाज़ है।

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  3. सब सच होता दिख रहा है ।।

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  4. लोग फिर भी नहीं समझे

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  5. Great
    Today everything is happening

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